2017-02-11

रोहिल्ला दर्जी समाज और गौत्र संबंधी जानकारी

   रोहिला-राजपूत” समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण,
स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30
प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके
पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको
आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है ।
यह सवर्विदित है और वेद पुराणों में उल्लिखित है कि हिन्दू समाज में चार वर्ण व्यवस्थाएं है जो इस प्रकार है – ज्ञान वर्द्धक और ज्ञानोपदेश तथा शिक्षा का कार्य करने वाले -ब्राह्रम्ण, कारोबार – व्यवसाय का कार्य करने वाले – वैश्य, वीरता के साथ युद्ध में देश-समाज की रक्षा करने वाले – क्षत्रिय तथा निम्नतर अर्थात मल-मूत्र आदि के कार्य में संलग्न को – शूद्र कहा जाता है । इस प्रकार समाज को चार वर्ग जातियों में पहचाना जाने लगा । तदंतर और अन्य कारोबार और निम्नतर कार्य के बीच के कार्य करने वाले समाज ने लोगों को उसकी कार्य विशेष से जाति सूचक माना जाने लगा ।
कालांतर में मुसलमानों के आक्रमण और उनके द्वारा किए गए अत्याचार के कारण बहुत सारे हिन्दू रोहिला-टांक क्षत्रिय बचकर कही छिप गए और उन्होंने अपने भरण-पोषण तथा अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए छोटे-छोटे कुटीर उद्योग, समाज के हितार्थ छोटे कार्य अपना लिए जिसके चलते शेष हिन्दू-रोहिला-टांक क्षत्रिय ने दर्जी, कपड़ों की छपाई-रंगाई इत्यादि कारोबार को अपना लिया । इसके साथ छोटे-छोटे गांवों, कस्बों, शहरों में इस व्यवसाय-कारोबार के नाम पर ही जांत-पांत स्थापित होती चली गई और वे अब पूरी तरह से प्रचलन में है । उसी जाति के अनुसार हिन्दू समाज के लोगों की एक बड़ी पहचान बन चुकी है जिसको कोई भी नहीं नकार सकता है और न ही कोई अपने आपको छिपा सकता है।
इसी कड़ी में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में से रोहिला-टांक समाज के मूल निवासियों को अपने पूर्वजों से जो संस्कारवश पहचान मिली है उसे वे बिल्कुल भी छोड़ने के लिए तैयार नहीं है ।
रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए
जाते हैं :-
रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत ,यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी
पुण्डीर, पांडला, पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया ,चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड ,निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार
राठौर, महेचा, महेचराना, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया ,बुन्देला, उमट, ऊमटवाल ,भारतवंशी, भारती, गनान ,नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया ,परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन ,तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय ,गहलौत, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक, कोकचे, काक ,कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद, मछेर ,सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा ,खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल,सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे ,सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया),बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया ,कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल ,यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड, लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया.

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