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26.11.22

निशुल्क सामूहिक विवाह: दर्जी समाज का ऐतिहासिक आयोजन |बोलिया में खुशियों की बौछार डॉ. आलोंक के साथ

 





मित्रों दामोदर दर्जी समाज की सामाजिक गतिविधियों के विडिओ प्रस्तुत करने की शृंखला मे आज का टॉपिक है 

नि:शुल्क दर्जी सामूहिक विवाह सम्मलेन पर एक रिपोर्ट
-रमेश चंद्र राठौर आशुतोष   की कलम से 

डॉ.दयाराम आलोक द्वारा वित्त पोषित


मन में संकल्प शक्ति हो और कुछ कर दिखाने की चाहत दिल में हो तो क्या संभव नहीं है? ऐसे ही व्यक्तित्व का परिचय आप सबके बीच है ,जिन्होने निस्वार्थ भाव से समाज हित के कार्य किये हैं।दामोदर दर्जी महासंघ के संस्थापक एवं संचालक डॉ.दयाराम जी आलोक ने महासंघ के झंडे तले 9 सामूहिक विवाह सम्मेलन करवाये हैं।सच तो ये है कि मन्दसौर जिले में सामूहिक विवाह की शुरूआत ही डॉ.आलोक साब के द्वारा सन 1981 में रामपुरा नगर में प्रथम सम्मेलन के रूप में की गई थी।
अपने अदम्य आत्म विश्वास के बलबूते आपने बोलिया कस्बे मे 13 अप्रेल 2010 को पूर्णतया नि:शुल्क सामूहिक विवाह रचा कर दर्जी समाज को निरंतर आगे बढ़ते रहने और निस्वार्थ समाज सेवा करते रहने का संदेश दिया|




13 अप्रेल,2010 मंगलवार: प्रात: ९ बजे आचार्य श्री राजेश जी शर्मा के द्वारा गणपति पूजन डॉ.दयारामजी आलोक साहेब के सानिध्य में सम्पन्न हुआ।
सम्मेलन परिसर में चाय नाश्ते की नि:शुल्क व्यवस्था रखी गई थी।
चाय के लिये अलग टी स्टाल लगाया गया था। डॉ.लक्ष्मीनारायण अलौकिक शामगढ के  आर्थिक सहयोग से चाय की व्यवस्था दिन भर चलती रही।

पानी की व्यवस्था की कमान श्री रामचन्द्रजी देशभक्त शामगढ के दोनों पुत्रों (दिलीप जी और विष्णु कुमार जी राठौर) ने संभाली। इनकी सहयोग राशि से से बर्फ़ के ठंडे पानी की व्यवस्था चलती रही जिसकी लोगों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।


डॉ.अनिल कुमार जी दामोदर की तरफ़ से पोहा-जलेबी का नाश्ता संचालित किया गया जो प्रात:८ बजे से १० बजे तक चला। वर-वधू के सभी पक्षों और सम्मलेन में पधारे सभी लोगों ने इन नि:शुल्क व्यवस्थाओं का भरपूर आनंद लिया।


 

इसके पश्चात प्रात: 10 बजे से ही मेहमानों के लिये भोजन शाला शुरू करने की मंच से घोषणा हुई। भोजन परोसने हेतु कोटडा बुजुर्ग से 75 व्यक्ति बुलवाये गये थे जिन्होने मेहमानों की मेहमानवाजी में कोइ कसर नहीं छोडी।


 
भोजन शाला प्रात: १० बजे से प्रारंभ होकर सम्मेलन समापन की घोषणा के बाद भी चलती रही। यह एक कीर्तिमान ही माना जा सकता है। आगंतुक मेहमानों की गणना इस बात से लगाई जा सकती है कि भोजन शाला में खपत पत्तलों की संख्या 4 हजार 5 सौ रही। तपती गर्मी में बर्फ़ का ठंडा पानी मिल जाए तो पूरी संतुष्टि। सम्मेलन के कार्यकर्ताओं ने दिन भर बर्फ़ीले पानी की सेवा की। समय-समय पर वर-वधू के आवासों में भी पानी पहुंचाने की व्यवस्था अनुकूल रही। यह व्यवस्था रामचंद्र जी देशभक्त शामगढ की तरफ़ से की गई थी।
इसके बाद सर्व प्रथम मंच से बोलियों का कार्यक्रम शुरु हुआ। निर्धारित धोली कलश प्रथम एवं द्वीतीय,जल कलश प्रथम एवं द्वितीय की बोलियां लगाईं गई जिसमें सभी दर्जी बंधुओं ने बढ चढकर भाग लिया।
धोली कलश प्रथम श्री रघुनाथजी भावसार के नाम पर ३५०० रू .पर समाप्प्त हुई।रघुनाथजी की पुत्रवधू सरोज बाला गांव बोलिया की सरपंच हैं।
श्री मति रघुनाथ जी भावसार जल कलश प्रथम उठाये हुए.



धोली कलश द्वितीय श्री राधेशामजी चौहान लाईन मेन शामगढ के नाम पर २२५० रू. की बोली पर समाप्त हुई।
अंतिम बाला -संजय जी चौहान जल कलश द्वितीय उठाये हुए-



इसी प्रकार जल कलश प्रथम ५०१ रू.तथा द्वितीय २५१ की बोली पर क्रमश: सर्व श्री माँगीलाल जी चौहान बोलिया और भंवरलाल जी चौहान संजीत के नाम बोली समाप्त हुई।
इसके बाद आई दामोदर ध्वजा की बोली जो निरंतर बढते हुए श्री रमेशजी राठौर शामगढ के नाम ३५०१ रू. की बोली पर समाप्त हुई।



ज्ञातव्य है कि रमेश जी राठौर ने समाजोपयोगी दो स्मारिकाओं का संपादन किया है पहली "समाज दर्शन "१९९३ में और दूसरी सन २००० में" समाज ज्ञान गंगा "। ये दोनो पुस्तकें आज भी समाज की जानकारी के लिये संदर्भ ग्रन्थो के रूप मे प्रचलित हैं।
चल समारोह के पूर्व डॉ.दयाराम जी आलोक ने उन सभी महानुभावों को साफ़ा बांधकर और श्री फ़ल भेंट कर सम्मानित किया जिन्होने नि:शुल्क सम्मेलन में ५०० रूपये से अधिक का सहयोग दिया था।

डॉ. दयाराम आलोकजी दर्जी बंधुओं को साफा- श्रीफल से सम्मानित करते हुए-





इन सहयोगकर्ताओं के नाम के बेनर भी बनवाकर सम्मेलन पांडाल में लगाए गए थे।इन बेनरों की कम्प्युटर डिजाईनिंग राहुल कुमार जी राठोर द्वारा की गई।जिन व्यक्तियों को साफ़ा और श्री फ़ल अर्पित कर सम्मानित किया गया उनके नाम इस प्रकार हैं-

सर्व श्री रमेश चन्द्रजी राठौर शामगढ़

श्री राधेशामजी चौहान लाईन मेन शामगढ,

श्री सुरेश चन्द्र जी पंवार डग,







श्री विनोद कुमार जी चौहान इंजीनियर ,झाबुआ,


श्री मोहनलाल जी राठौर शामगढ,






श्री रमेश चंद्र जी मकवाना कोटा,



डॉ.कैलाश चंद्र जी चौहान जग्गाखेडी,



श्री नंदराम जी सोलंकी गरोठ,




श्री रामचन्द्र जी देशभक्त शामगढ,




श्री जगदीश जी चौहान नीमच,






श्री प्रकाश जी सोलंकी ठेकेदार शामगढ,





श्री अमरचन्द जी सोलंकी बोलिया ,

श्री हेमेन्द्र कुमार जी टेलर झाबुआ







श्री भंवरलाल जी चौहान संजीत,





श्री राजेंद्र कुमार जी परमार रानापुर,





श्री भगवती लालजी चौहान संजीत,




श्री प्रदीपजी सोलंकी नीमच,



श्री रमेश चंद्र जी चौहान, बोलिया

श्री मांगीलाल जी चौहान बोलिया,



श्री रमेशजी मकवाना रतनगढ (नीमच),


श्री कमल किशोरजी मकवाना नीमच,



श्री घनशाम जी चौहान हथुनिया,



श्री प्रकाश जी नवीन टेलर डग,


श्री नारायण जी राठौर बोलिया,


श्री गोर्धन जी पंवार दुहनिया,


श्री बालमुकंद जी बाघेला डग,



श्री बालाराम जी परमार खारखेडा वाले बोलिया,


श्री संतोष कुमार जी सिसोदिया मेलखेडा,




श्री मांगीलालजी परमार बोलिया,


श्री प्रवीण जी परमार राणापुर,

 
श्री अमरचन्द जी राठौर बोलिया .

भवानी मंडी के दर्जी नवयुवक मंडल द्वारा डॉ दयाराम जी आलोंक का सम्मान किया गया



इस प्रथम नि:शुल्क विवाह आयोजन की आशातीत सफ़लता के मध्येनजर भवानी मंडी के नवयुवक मंडल के पदाधिकारियों ने समाज की ओर से आलोक जी का साफ़ा बांधकर, श्री फ़ल भेंट कर और स्मृति चिन्ह प्रदान कर अभिनंदन किया। दामोदर बंधुओं को ऐसे सामाजिक कार्यक्रमों के आयोजकों की मेहनत और लगन को कभी नजर अंदाज नहीं करना चाहिये । यह गौरव का विषय है कि मन्द्सौर जिले के दो कीर्तिमान दर्जी समाज के नाम करने का श्रेय श्री दयाराम जी आलोक को ही है।
सन १९८१ में मंदसौर जिले का प्रथम सामुहिक सम्मेलन रामपुरा नगर में दामोदर दर्जी महासंघ के बेनर तले आलोक जी के नेतृत्व में आयोजित किया गया था।और जहां तक नि:शुल्क सम्मेलन की बात है ,बोलिया ग्राम में मंदसौर जिले का यह प्रथम नि:शुल्क सामूहिक विवाह होकर यह कीर्तिमान भी  दयाराम जी आलोक के खाते में इतिहास में दर्ज रहेगा। 
किसी भी अन्य समाज में अभी तक तो नि:शुल्क सम्मेलन मंदसौर जिले में नहीं हुआ है।
रात-दिन मेहनत करके और निंदा करने वालों के तरह तरह के ताने सुनकर भी जो व्यक्ति हिम्मत पस्त न होकर निरंतर समाज हित की योजनाओं में लगा रहता हो ,समाज की तरफ़ से ऐसे व्यक्ति का सम्मान करना अच्छी परम्परा है | 



दामोदर भवन में जल कलश भरने का दृश्य -





बंधुओं, सम्मान समारोह के बाद अब आई चल समारोह की बारी। सभी लहरिया साफ़ा धारी मर्द और उनके ठीक आगे दामोदर महाराज का ध्वज लिये रमेशजी राठौर ,बैन्ड बाजे,ढोल एवं धोली कलश जल कलश उठाकर कतारों में चलती महिलाएं ।

शोभा यात्रा के कुछ चित्रों की बानगी प्रस्तुत है-









शोभा यात्रा का चित्र -










शोभा यात्रा के चित्र -





समेलन के चित्र इस लिंक में भी हैं-
https://www.flickr.com/photos/45029042@N08/sets/72157644865375150/


 



यह था जूलूस का सेटिंग। चल समारोह सम्मेलन प्रांगण से दामोदर भवन तक और फ़िर वापसी में सम्मेलन पांडाल पहुंचा। चल समारोह की विडियोग्राफ़ी दुर्लभ दृष्यों से परिपूर्ण।
विवाह मंडप में पहुंचते ही लाडियों को विवाह वेदी पर बुलवाया गया। दूल्हों को तोरण रस्म के लिये आमंत्रित किया गया। इसी बीच सम्मेलन में आमंत्रित विशिष्ठ अतिथियों का आगमन हुआ।


 

आगंतुक महानुभाओं में पूर्व विधायक श्री राजेशजी यादव,गरोठ नगर पंचायत अध्यक्ष श्री राजेशजी चौधरी और महाविद्यालय गरोठ के अध्यक्ष श्री चंदरसिंहजी सिसोदिया अपने सहयोगी साथियों के साथ पधारे थे। डॉ.आलोक साब ने सभी अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया। अपने उद्बोधन में पूर्व विधायक महोदय ने सम्मेलन की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए नव जोडों के उज्वल भविष्य की कामना की।


दूल्हों ने तोरण मारा।



अब प्रत्येक जोडे को एक के बाद एक स्टेज पर रखे भव्य आसन पर बिठाकर उनके माता-पिता और परिजनों द्वारा आशीर्वाद देते हुए विडियो ग्राफ़ी की गई। स्टेज शो का ऐसा कार्यक्रम अन्य सम्मेलनों में क्या आपने कभी देखा है? ऐसी व्यवस्था विरले ही देखने को मिलती है। यह कार्यक्रम अत्यंत आकर्षक रहा और दर्शकों ने बहुत प्रशंसा की।

कुछ जोड़ों के चित्र प्रस्तुत हैं 


















कहने का मतलब ये कि सम्मेलन की हर व्यवस्था इतनी उम्दा ,चाक-चौबंद और सुनियोजित थी कि दर्शकों का मन मोह लिया।
प्रत्येक कन्या को दी गयी डायचे की वस्तुएँ-

३१ गृहोपयोगी बर्तन जिसमें कूकर भी शामिल।

स्टील की आल्मारी गोदरेज टाईप नग एक

प्लाई पलंग एक

रजाई,गादी,तकिये का एक सेट

इनके अलावा ११-११ बर्तन धार्मिक किताबें और हर जोडे को २७०१ रू. कन्यादान के प्रदान किये गये।

 आचार्य श्री राजेशजी शर्मा ने वैदिक विधि-विधान से पाणिग्रहण संस्कार संपन्न करवाया। ४.बजकर ३० मिनिट पर अध्यक्ष महोदय ने सम्मेलन समापन की मंच से घोषणा की। दर्जी बंधुओं से निवेदन किया गया कि शाम का भोजन करने के बाद ही घर जाएं।
इसके बाद वर-वधू पक्षों को सेव मिठाई के पेकेट बनाकर वितरित किये गये। जिन महिलाओं और पुरुषों ने कन्यावर रखा था उनके लिये भोजन शाला में भोजन की व्यवस्था समापन पश्चात भी निरंतर चालू रखी गई।
प्रथम निशुल्क दर्जी सामूहिक  विवाह की यह प्रस्तुति  यहीं समाप्त करते हैं ,धन्यवाद आभार! 

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20.10.22

दर्जी जाति की जानकारी और इतिहास:history of darji caste






दर्जी वस्त्र सीने की विशिष्ट योग्यता रखने वाला व्यक्ति होता है। वह व्यक्ति के शरीर की माप के अनुसार कपड़ा सीकर उसे वस्त्र का रूप देता है।

दर्जी इतिहास:

 हिंदू दर्जी समुदाय का कोई केंद्रीय इतिहास नहीं है। यह उस समुदाय के लोगों पर निर्भर करता है जहां वे रह रहे थे। कुछ लोगों से अपने इतिहास से संबंधित प्राचीन और मध्यकालीन युग , कुछ से संबंधित Tretayuga (चार में से एक युग में वर्णित हिंदू प्राचीन ग्रंथों की तरह, वेद , पुराण , आदि)। लेकिन सभी हिंदू दर्जी समुदाय की उत्पत्ति क्षत्रिय वर्ण से हुई है। क्षत्रिय होने का प्रमाण गोत्र है, इनके गोत्र क्षत्रिय वर्ण से हैं।

  भारत के गुजरात, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र  , छत्तीसगढ़, उड़ीसा, कर्नाटक, बिहार आदि राज्यों में इनकी अच्छी खासी आबादी है. धर्म से यह हिंदू या मुसलमान हो सकते हैं. हिंदू समुदाय में इन्हें हिंदू दर्जी या क्षत्रिय दर्जी कहा जाता है, क्योंकि इन्हें मुख्य रूप से क्षत्रिय वर्ण का गोत्र माना जाता है. मुस्लिम समुदाय में दर्जी जाति को इदरीशी (हजरत इदरीस के नाम पर) के नाम से जाना जाता है.

दर्जी शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

सिलाई के कार्य से जुड़े होने के कारण इनका नाम दर्जी पड़ा. कहा जाता है कि “दर्जी” शब्द की उत्पत्ति फारसी भाषा के शब्द “दारजान” से हुई है, जिसका अर्थ होता है- “सिलाई करना”. हिंदुस्तानी भाषा में दर्जी का शाब्दिक अर्थ है- “टेलरिंग का काम करने वाला या सिलाई का काम करने वाला’. कहा जाता है कि पंजाबी दर्जी हिंदू छिम्बा जाति से धर्मांतरित हुए हैं, और उनके कई क्षेत्रीय विभाजन हैं जैसे- सरहिंदी, देसवाल और मुल्तानी. पंजाबी दर्जी (छिम्बा दारज़ी‍‌‌) लगभग पूरी तरह सुन्नी इस्लाम के अनुयाई हैं. इदरीसी दर्जी दिल्ली सल्तनत ‌के शुरुआती दौर में दक्षिण एशिया में बस गए थे. यह भाषाई आधार पर भी विभाजित हैं. उत्तर भारत में निवास करने वाले उर्दू, हिंदी समेत विभिन्न भाषाएं बोलते हैं, जबकि पंजाब में रहने वाले पंजाबी भाषा बोलते हैं.

दामोदर दर्जी समाज का इतिहास

  
जाति इतिहास लेखक डॉ.दयाराम आलोक के मतानुसार गुजरात मे 14 वीं शताब्दी मे जबरन इस्लामिकरण और तत्कालीन इस्लामिक शासकों द्वारा हिंदुओं के प्रति हिंसक घटनाओं से प्रताड़ित होकर दामोदर वंशीय क्षत्रिय दर्जी समाज जूनागढ़,भावनगर,जामनगर ,लिमड़ी आदि स्थानो को छोड़कर मध्य प्रदेश और राजस्थान मे आ बसे| जो पहिले गुजरात छोड़कर आए वे जूना गुजराती क्षत्रिय दर्जी कहलाए । करीब 125 वर्ष बाद इसी समाज का दूसरा जत्था गुजरात छोड़कर मध्य प्रदेश और राजस्थान के गांवों -शहरों मे बस गया। बाद मे आए दर्जी समुदाय को दामोदर वंशी नए गुजराती क्षत्रीय दर्जी कहा जाने लगा।दामोदर दर्जी समाज के परिवारों की गौत्र क्षत्रियों की है जिससे ज्ञात होता है की इनके पुरखे क्षत्रिय  थे।  दामोदर वंशी जूना गुजराती "सेठ" उपनाम  का उपयोग करते हैं। 
 दर्जी समाज की सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा पाठक वाली वेबसाईट का Address है -  damodarjagat.blogspot.com . 
इस वेबसाईट के पांच लाख से ज्यादा पाठक हैं।
  हिंदू दर्जी समुदाय की उत्पत्ति के बारे में भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग किंवदंतियां प्रचलित हैं. रा. भारत में निवास करने वाले हिंदू दर्जी अनेक कुलों में विभाजित हैं. इनके प्रमुख कुल हैं-
काकुस्त,
दामोदर वंशी नया गुजराती दर्जी (अधिकांश लोग मंदसौर,नीमच,प्रतापगढ़ ,रतलाम ,झालावाड़ जिलों मे हैं)
टाँक,
दामोदर वंशी जूना गुजराती. (अधिकांश लोग मध्य प्रदेश ,राजस्थान के कुछ ही जिलों मे बसे हैं)
उड़ीसा  के दर्जी  महाराणा, महापात्र आदि उपनामो का प्रयोग करते हैं.
 
मुस्लिम दर्जी कुरान और बाइबिल में वर्णित हजरत इदरीस (Prophet Idris) के वंशज होने का दावा करते हैं. इनकी मान्यताओं के अनुसार, हजरत इदरीस सिलाई का काम सीखने वाले पहले व्यक्ति थे. उनका मानना है कि हजरत इदरीसी असली शिक्षक थे, जिनसे उनके पूर्वजों ने सिलाई की कला सीखी थी. उत्तर प्रदेश में निवास करने वाले मुस्लिम दर्जी खय्यात के नाम से भी जाने जाते हैं.

भ्रम व भ्रांतियांः-

‘‘दर्जी राजपूत’’ समाज अलग-अलग कहानियों को लेकर बंटा हुआ है। सबसे बड़ी भ्रांति
 महाराष्ट्र के संत नामदेव जी को दर्जी जाति के आराध्य के रूप में दर्शाया जा रहा है और उन्हें क्षत्रिय कुल से बताया जाता है। ‘‘पवित्र गुरू ग्रंथ साहिब’’ में संकलित सभी संतों के इतिहास को पढ़ने के बाद एवं छीपा समाज द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं एवं संत नामदेव से संबधित अन्य पुस्तकों को पढ़ने के बाद पता चलता हैं कि संत नामदेव जी महाराज का जन्म एक छीपा जाति में हुआ था, जो कपड़े के व्यापार से जुड़े थे तथा संत पीपाजी महाराज एक राजपूत थे, जिन्होने अहिंसक सिलाई कर्म को अपनाया। इस तरह दर्जी जाति एक राजपूत वर्ग - नामदेव छीपा जाति (छपाई करने वाले) से पूरी तरह भिन्न है और आज भी इनके बीच किसी प्रकार का मेल-मिलाप नहीं है, लेकिन सिलाई कार्य को लेकर दोनों जातियो में भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
Disclaimer:इस लेख में दी गई जानकारी Internet sources, Digital News papers, Books और विभिन्न धर्म ग्रंथो के आधार पर ली गई है. विषय वस्तु  को अपने बुद्धी विवेक से समझे।
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यूट्यूब विडिओ की प्लेलिस्ट -


*भजन, कथा ,कीर्तन के विडिओ

*दामोदर दर्जी समाज महासंघ  आयोजित सामूहिक विवाह के विडिओ 

*दर्जी समाज मे मोसर (मृत्युभोज) के विडिओ 

पौराणिक कहानियाँ के विडिओ 

मंदिर कल्याण की  प्रेरक कहानियों के विडिओ  भाग 1 

*दर्जी समाज के मार्गदर्शक :जीवन गाथा 

*डॉ . आलोक का काव्यालोक

*दर्जी  वैवाहिक  महिला संगीत के विडिओ 

*मनोरंजन,शिक्षाप्रद ,उपदेश के विडिओ 

*मंदिर कल्याण की प्रेरक कहानियाँ भाग 2 

*मंदिर  कल्याण की प्रेरक कहानियाँ के विडिओ भाग 3 

*मुक्ति धाम विकास की प्रेरक कहानियाँ भाग 2 

*मुक्ति धाम विकास की प्रेरक कहानियाँ भाग 3 

*मंदिर कल्याण की प्रेरक कहानियां के विडिओ भाग 4 

मंदिर कल्याण की प्रेरक कहानियाँ के विडिओ भाग 5 

*भजन,कथा कीर्तन के विडिओ 

*मंदिर कल्याण की प्रेरक कहानियाँ के विडिओ  भाग 6 

*मंदिर कल्याण की प्रेरक कहानियाँ के विडिओ भाग 7 

*मनोरंजन,शिक्षा ,पर्यटन,उपदेश के विडिओ 

*मनोरंजन ,कॉमेडी के विडिओ 

*जातियों के महापुरुषों की जीवनी के विडिओ 

*धार्मिक ,सामाजिक त्योहार व  जुलूस के विडिओ