}

15.3.18

दामोदर क्षत्रीय दर्जी प्रतिहार (पड़िहार) वंश के गोत्र-प्रवरादि

                                   

pratihar rajput
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वंश                –           सूर्य वंश

गोत्र               –            कपिल

वेद                –           यजुर्वेद

शाखा             –           वाजस्नेयी

प्रवर               –  कश्यपअप्सारनैधुव

उपवेद            –            धनुर्वेद

कुल देवी         –         चामुंडा माता

वर देवी           –         गाजन माता

कुल देव           –       विष्णु भगवान

सूत्र                 –        पारासर

शिखा              –        दाहिनी

कुलगुरु            –        वशिष्ट

निकास            –         उत्तर


मेरा समाज मेरी कहानी


प्रमुख गादी   – भीनमालमंडोर,कन्नोज

ध्वज                – लाल (सूर्य चिन्ह युक्त)

वॄक्ष                 – सिरस

पितर          – नाहङरावलूलर गोपालजी

नदी                  –        सरस्वती

तीर्थ                  –       पुष्कर राज

मन्त्र                  –      गायत्री जाप

पक्षी                   –       गरुड़

नगारा                 –        रणजीत

चारण                 –         लालस

ढोली                  – सोनेलिया लाखणिया विरद
                 
                           –   गुजरेश्वरराणा ,

12.3.18

दामोदर क्षत्रीय दर्जी परमार (पँवार) वंश की कुलदेवी और गौत्र-प्रवरादि

परमार ( पंवार ) क्षत्रियो की कुलदेवी 
सच्चियाय ( सच्चिवाय ) माता का भव्य मंदिर जोधपुर से लगभग ६० कि. मी. की दूरी पर ओसियॉ में स्थित है इसी लिये इनको ओसियॉ माता भी कहा जाता है , ओसियॉ पुरातत्विक महत्व का एक प्राचीन नगर है , ओसियॉ शहर कला का एक महत्वपूर्ण केन्द्र होने के साथ ही धार्मिक महत्व का क्षेत्र रहा है यहॉ पर ८ वीं १२ वीं शताब्दी के कालात्मक मंदिर ( ब्रह्मण एवं जैन ) और उत्कष्ट मूर्तियॉ विराजमान है , परमार क्षत्रियो के अलावा यह ओसवालो की भी कुलदेवी है , स्थानीय मान्यता के अनुसार इस नगरी का नाम पहले मेलपुरपट्टन था , बाद में यह उकेस के नाम से जाना गया फिर बाद में यह शब्द अपभ्रंश होकर ओसियॉ हो गया , एक ढुण्ढिमल साधू के श्राप दिये जाने पर यह गॉव उजड गया था , उप्पलदेव परमार राजकुमार के द्वारा यह नगर पुन: बसाया गया था , उसने यहा ओसला लिया था अथवा शरण ली थी , इसी के कारण इस नगर का नाम ओसियॉ नाम पड गया था , लेखको के आधार पर भीनमाल के परमार राजकुमार के द्वारा ओसियॉ नगर बसाने का उल्लेखनीय मिलता है ।।
     
भीनमाल में राजा भीमसेन पंवार राज्य करते थे उनके दो पुत्र हुये बडा उपलदा और छोटा सुरसुदरू राजा भीमसेन ने अपने छोटे पुत्र को उत्तराधिकारी घोषित कर बडे पुत्र उपलदे को देश निकाला दे दिया था , तब राजकुमार उपलदे ने इसी जगह ओसियॉ में शरण ली थी जो ये जगह उजडी हुई पडी थी , वहा पर एक माता जी का स्थान था जहा पर माँ के चरण चिन्ह के निशान एक चबूतरे पर स्थित थे , उसने आकर माँ को प्रणाम किया और रात्रि होने पर वहा सो गया , तब श्री चामुण्डा देवी जी ने प्रगट होकर पूछा कि तू कौन है , इस पर उपलदे ने कहा कि में पंवार राजपूत हू यहा पर नगर बसाना चाहता हूँ , तब देवी जी ने कहा कि सूर्य उदय होने पर जितनी दूर तक तुम अपना घोडा घुमाओगे शाम तक उस जगह मकान बन जायेंगे दिन उगने पर उसने अपना घोडा ४८ कोस तक घुमाया और घर बसने लगे मगर रात्री मे सभी घर फिर ध्वस्त होने लगे , तब राजकुमार ने देवी से कहा कि माँ ये क्या हो रहा है माँ ने कहा कि तू पहले मेरा मंदिर बना तब तेरा शहर निर्माण करना राजकुमार बोला माँ मेरे पास तो कुछ भी नही है में तेरा मंदिर कैसे निर्माण करवाऊ माँ ने तभी गढा हुआ धन पानी सभी सामग्री बताई , मंदिर का निर्माण होने पर उपलदे ने देवी से पूछा कि मूर्ति सोना चॉदी ,या पत्थर की कराऊ तब देवी जी ने कहा कि तुम शांत रहना में स्वयं पृथ्वी से प्रगट होऊँगी , माता जब तीसरे दिन धरती से पृगट हुई तब आकाश में से जोर से गर्जना हुई मानो भूकम्प आ गया हो , देवी ने राजकुमार से कहा था कि तुम चिल्लाना मत मगर राजकुमार डर की बजह से चिल्लाना लगा तब माता धरती में से आधी निकली और आधी जमीन के अंदर ही रह गयी इस पर माता राजकुमार पर कुपित हुई मगर माँ तो माँ होती है माता ने उसको मॉफ कर दिया , और मंदिर के सामनेमहल बनाकर रहने को कहा , राजकुमार बोला कि माँ मकान तो बन गये अब बस्ती कहा से लाऊँ तब माता ने कहा कि भीनमाल जाकर अपने भाई से बस्ती की मॉग कर तभी उपलदे ने अपने भाई से बस्ती देने को कहा तो उसने मना कर दिया दौनो भाइयो में युद्द होने लगा मगर माँ की कृपा से उपलदे का बालबाका भी नही हुआ उसने अपने भाई को पकड लिया , और उसी समय उसने भीनमाल का आधा पट्टा अपने कब्जे में कर लिया ,इसी प्रकार भीनमाल ने ओसियॉ नगर की स्थापना की जिसको ओसियॉ माता या सच्चियाय माता के नाम से माता का मंदिर जाना जाता है ।।


मेरा समाज मेरी कहानी

     ओसियॉ के पहाडी पर अवस्थित मंदिर परिसर में सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रसिद्द सच्चियाय माता का मंदिर १२ वीं शताब्दी के आसपास बना यह भव्य और विशाल मंदिर महिषमर्दिनी ( दुर्गा) को समर्पित है , उपलब्ध साक्ष्यो से पता चलता है कि उस युग में जैन धर्मावलम्बी भी देवी चण्डिका अथवा महिषमर्दिनी की पूजा - अर्चना करने लगे थे, तथा उन्होने उसे प्रतिरक्षक देवी के रूप में स्वीकार किया था , परंतु उन्होने देवी के उग्र रूप या हिंसक के बजाय उसके ललित एवं शांत स्वरूप की पूजा अर्चना की , अत: उन्होने माँ चामुण्डा देवी के वजाय सच्चियाय माता ( सच्चिका माता ) नाम दिया था , सच्चियाय माता श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय के ओसवाल समाज के साथ परमारों ( पंवारो ) सांखला , सोढा राजपूतो की ईष्टदेवी या कुलदेवी है , सच्चियाय माता के मंदिर के गर्भ गृह के बाहर की एक अभिलेख उत्तकीर्ण है जिसमें १२३४ ( ११७८ ई. ) का लेख जिसमें सच्चियाय माता मंदिर में चण्डिका , शीतला माता , सच्चियाय , क्षेमकरी , आदि देवियो और क्षेत्रपाल की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठापित किये जाने का उल्लेख हुआ है , ।।


 परमार वंश की कुलदेवी  और गौत्र-प्रवरादि
वंश - अग्निवंश
कुल - परमार
गोत्र- वशिष्ठ
प्रवर - तीन , वशिष्ठ , अत्रि , साकृति
वेद - यजुर्वेद
उपवेद - धनुर्वेद
शाखा - वाजसनयि
प्रथम राजधानी - उज्जैन ( मालवा )
कुलदेवी - सच्चियाय माता
ईष्टदेव - माण्डवराव (सूर्य )
महादेव - रणजूर महादेव
गायत्री- ब्रह्मगायत्री
भैरव - गोरा - भैरव
तलवार- रणतरे
ढाल - हरियण
निशान- केसरी सिंह
ध्वज - पीला रंग
गढ - आबू
शस्त्र- भालो
गाय- कवली गाय
वृक्ष- कदम्ब , पीपल
नदी - सफरा ( शिप्रा)
पक्षी - मयूर
पाधडी - पचरंगी

दामोदर क्षत्रीय दर्जी मकवाना (झाला )वंश के गोत्र-प्रवरादि


वंश                   –      सूर्य वंश

गोत्र                  –       मार्कण्डेय

शाखा                –       मध्यनी

कुल                  –       मकवान(मकवाणा)

पर्व तीन             –      अश्व, धमल, नील
             

कुलदेवी         – दुर्गा,मरमरा देवी,शक्तिमाता


इष्टदेव              –      छत्रभुज महादेव

भेरव               –       केवडीया

कुलगोर           –       मशीलीया राव

शाखाए           –        झाला,राणा


दर्जी समाज के विडियो की लिंक्स-






झाला वंश की कुलदेवी.....
झालावंश का प्राचीन नाम मकवाना था। उनका मूल निवास कीर्तिगढ़ (क्रान्तिगढ़ ) था। हरपाल मकवाना का मूल निवास कीर्तिगढ़ था जहाँ सुमरा लोगों से लड़ाई हो जाने के बाद वह गुजरात चला गया जहां के राजा कर्ण ने उसे पाटड़ी की जागीर सोंप दी। मरमर माता को मकवानों की कुलदेवी माना जाता है कालान्तर में मकवानों को झालावंश कहा जाने लगा। अनन्तर आदमाता अथवा शक्तिमाता को झालावंशज कुलदेवी के रूप में पूजने लगे ।



मेरी सामाजिक कहानी


राजकवि नाथूरामजी सुंदरजी कृत बृहद ग्रन्थ झालावंश वारिधि में हरपालदेव को पाटड़ी की जागीर मिलने के सम्बन्ध में वृत्तान्त दिया गया है कि हरपाल क्रान्तिगढ़ छोड़कर गुजरात में अन्हिलवाड़ा पाटन की ओर रवाना हुआ। मार्ग में उसकी प्रतापसिंह सोलंकी से भेंट हुई जो उसे पाटन में अपने घर लाया। जहाँ उसकी भेंट एक सुन्दर कन्या से हुई। वह कन्या शक्ति स्वरूपा थी। हरपाल ने राजा कर्ण से भेंट की। परिचय पाकर कर्ण ने उसको अपने दरबार में रख लिया। उस समय राजा कर्ण की रानी को बावरा नामक भूत ने त्रस्त कर रखा था। जब राजा कर्ण सिरोही से विवाह कर लौट रहा था तो मार्ग में पालकी में बैठी देवड़ी रानी के इत्र की शीशी ऐसे स्थान पर फूट गयी जहां बावरा भूत का निवास था। इत्र उस पर गिर गया और वह रानी के साथ पाटन आ गया। तब से वह रानी को सता रहा था। हरपाल ने रानी को उस भूत से मुक्ति दिलाने का निश्चय किया। वह महलों में गया और अपनी कुलदेवी मरमर माता की आराधना कर अपनी विधियों तथा उस चमत्कारी शक्तिरूपा कन्या की सहायता द्वारा भूत को प्रताड़ित करना शुरू किया। बावरा भूत ने हरपाल से उसे छोड़ने की प्रार्थना की और वचन दिया कि वह आगे से उसका सहायक बन कर काम करेगा। हरपाल ने बावरा को छोड़ दिया। हरपाल देवी हेतु बलिदान के लिए श्मशान गया। वहां शक्तिदेवी / मरमर माता प्रसन्न हुई और वर मांगने को कहा। हरपाल ने प्रतापसिंह की भैरवीरूपा कन्या से विवाह की इच्छा जताई। शक्तिदेवी ने उसे आशीर्वाद दिया। हरपाल ने उस कन्या से विवाह कर लिया।
उधर कर्ण ने उसकी रानी को प्रेतात्मा से मुक्ति दिलाने के बदले हरपाल को कुछ मांगने को कहा। इस पर शक्ति के कथनानुसार हरपाल ने उत्तर दिया कि एक रात में आपके राज्य के जितने गाँवों को तोरण बाँध दूँ, वे गाँव मुझे बक्षे जावें। राजा ने मंजूर कर लिया। हरपाल ने शक्तिदेवी और बावरा भूत की मदद से एक रात्रि में पाटड़ी सहित 2300 गाँवों में तोरण बाँध दिए। राजा को अपने वचन के अनुसार सभी गाँव हरपाल को देने पड़े। इससे राजा घबरा गया क्योंकि उस राज्य का अधिकाँश भाग हरपाल के पास चला गया था। राजा का यह हाल देखकर हरपाल ने भाल इलाके के 500 गांव राजा कर्ण की पत्नी को ‘कापड़ा’ के उपलक्ष्य में लौटा दिए

दामोदर क्षत्रीय दर्जी सोलंकी वंश का गोत्र-प्रवरादि

      
वंश             –              अग्निवंश
गोत्र            –            वशिष्ठ, भारदाज
प्रवर तीन     – भारदाज, बार्हस्पत्य, अंगिरस
वेद             –              यजुर्वेद
शाखा         –           मध्यन्दिनी
सूत्र            –            पारस्कर, ग्रहासूत्र
इष्टदेव        –             विष्णु

कुलदेवी      –          चण्डी, काली, खीवज
नदी           –            सरस्वती
धर्म           –             वैष्णव
गादी          –             पाटन
उत्पति        –           आबू पर्वत
मूल पुरुष      –         चालुक्य देव
निशान          –          पीला
राव              –         लूतापड़ा
घोड़ा            –              जर्द
ढोली            –             बहल
शिखापद       –           दाहिना
दशहरा पूजन  –            खांडा

दामोदर क्षत्रीय दर्जी चौहान वंश के गोत्र-प्रवरादि


वंश – अग्निवंश
वेद – सामवेद
गोत्र – वत्स
वॄक्ष – आशापाल
नदी – सरस्वती
पोलपात – द्सोदी
इष्टदेव – अचलेश्वर महादेव

           

कुल देवी – आशापुरा
नगारा – रणजीत
निशान – पीला
झंडा – सूरज, चांद, कटारी
शाखा – कौथुनी
पुरोहित – सनादय(चन्दोरिया)
भाट – राजोरा
धुणी – सांभर


मेरा समाज मेरी कहानी


भेरू – काला भेरव
गढ़ – रणथम्भोर
गुरु – वशिष्ठ
तीर्थ – भॄगु क्षेत्र
पक्षी – कपोत
ऋषि – शांडिल्य
नोबत – कालिका
पितृ – लोटजी
प्रणाम – जय आशापुरी
विरद – समरी नरेश

दर्जी समाज के विडियो की लिंक्स-

Alpana and Vinod Chouhan in Damodar Mahila Sangeet


Neha and Deepesh Darji in Damodar Mahila Sangeet,Shamgarh

Arpita Rathore in Damodar Mahila Sangeet

Sunita in Damodar Mahila Sangeet

Apurva in Damodar Mahila Sangeet

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Arpita Apurva Sadhna in Damodar Mahila Sangeet

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दामोदर क्षत्रीय दर्जी सीसोदिया (गुहिलोत) वंश के गौत्र-प्रवरादि


वंश – सूर्यवंशी,गुहिलवंश,सिसोदिया गोत्र – वैजवापायन
प्रवर – कच्छ, भुज, मेंष
वेद – यजुर्वेद
शाखा – वाजसनेयी
गुरु – द्लोचन(वशिष्ठ)
ऋषि – हरित


कुलदेवी – बाण माता
कुल देवता – श्री सूर्य नारायण
इष्ट देव – श्री एकलिंगजी
वॄक्ष – खेजड़ी
नदी – सरयू
झंडा – सूर्य युक्त
पुरोहित – पालीवाल
भाट – बागड़ेचा



मेरा समाज मेरी कहानी


चारण – सोदा बारहठ
ढोल – मेगजीत
तलवार – अश्वपाल
बंदूक – सिंघल
कटार – दल भंजन
नगारा – बेरीसाल
पक्षी – नील कंठ
निशान – पंच रंगा
निर्वाण – रणजीत
घोड़ा – श्याम कर्ण
तालाब – भोडाला
विरद – चुण्डावत, सारंगदेवोत
घाट – सोरम
ठिकाना – भिंडर
चिन्ह – सूर्य
शाखाए – 24


दर्जी समाज की विडियो लिंक्स-

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11.3.18

दामोदर क्षत्रीय दर्जी राठौर (राठोड़) वंश के गौत्र-प्रवरादि

                      


गोत्र                   –        गोतमस्य
नदी                   –         सरयू
कुण्ड                 –         सूर्य
क्षेत्र                    –         अयोध्या
पुत्र                     –          उषा
पितृ                    –        सोमसायर
गुरु                     –        वशिष्ठ
पुरोहित               –         सोह्ड़
कुलदेवी              –       नागनेचिया
नख                    –       दानेसरा
वेद                     –     शुक्ल यजुर्वेद
घोड़ा                  –       दलसिंगार
तलवार               –        रणथली
माला                  –        रत्न
वंश                    –       इक्ष्वाकु (रघुवंशी)
धर्म                    –        सन्यास
बड़                    –         अक्षय
गऊ                    –         कपिला
नगारा                  –        रणजीत
निशान                 –        पंचरंगा
ढोल                    –         भंवर
दमामी                 –         देहधङो
भाट                    –         सिंगेल्या
बारहठ                 –         रोहङिया
शिखा                  –         दाहिनी
गादी                   –           लाहोर
चिन्ह                   –            चील
इष्ट                      –          सीताराम
सम्प्रदाय               –           रामानुज
पोथी                   -बडवा,रानीमंगा,कुलगुरु
शाखा                  –  साडा तेरह (131/2)
उपाधि                 –    रणबंकाकमध्व्ज


दर्जी समाज के विडियो की लिंक्स-

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दर्जी सामूहिक विवाह सम्मेलन ,शामगढ़ -Video clip


3.2.18

*अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ -एक विवेचन

           https://youtu.be/iJnZ0n7r6vA                                     
 

 नये गुजराती दर्जी समाज की वो संस्था जो 1965 से समाज के लिए विविध कार्य करती आ रही है। इसकी स्थापना 1965 में आदरणीय दयारामजी आलोक शामगढ़ ने की और इसका संविधान लिखा  तथा संविधान मे जरूरी संशोधन डॉ.लक्ष्मी नारायण जी अलौकिक  द्वारा किए गए |
*महासंघ के झंडे तले दर्जी समाज का सर्व प्रथम सामूहिक विवाह सम्मेलन 1981 में रामपुरा में हुआ था । जो मन्दसौर जिले में किसी भी समाज का पहला सम्मेलन था । उसके बाद 1983 में रामपुरा दर्जी समाज ने महासंघ के तत्वावधान में समाज का दूसरा सफल सम्मेलन आयोजित कर अपनी लोकप्रियता बनाई।इसी प्रकार 1990 में शामगढ़ , 2006 ,2008 , 2010 में बोलिया में महासंघ द्वारा सामूहिक विवाह सम्मेलन डा. आलोक साहेब के अध्यक्षता में संम्पन्न हुए ।ज्ञातव्य हो की 2010 वाला सामूहिक विवाह सम्मेलन नया गुजराती दर्जी समाज का प्रथम निशुल्क विवाह आयोजन था जिसका सम्पूर्ण खर्च डा. आलोक सा. ने वहन किया था ।
शामगढ़ में महासंघ के तत्वावधान में 2012 ,2014 व 2017 में ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित कर दर्जी समाज को गौरवान्वित किया है । महासंघ की कार्य पद्धति से प्रभावित होकर अब समाज में महासंघ द्वारा आयोजित सम्मेलन के प्रति अटूट आस्था बन चुकी है।
दामोदर दर्जी महासंघ की विशेषता -
अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ की सबसे ,बड़ी व अच्छी विशेषता यह रही है कि अपने आयोजन को मितव्ययता से आयोजित करना , आना पाई का हिसाब बनाकर आय व्यय का लेखा समाज बीच रखकर बचत राशि को विवाह पक्षों में बांटना रहा है।*
 
 *रमेश राठौर "आशुतोष"* की कलम से.....✒
जय दामोदर*************
★★★★★★★★★★★★

29.12.17

दामोदर वंशी दर्जी समुदाय के आदि पुरुष संत दामोदर जी महाराज की जीवनी

       दामोदर वंशी दर्जी समुदाय के आदि पुरुष  संत दामोदर जी महाराज की जीवनी                                                  
    
                               
                                                 
         
  प्राचीन नगर जूनागढ़ (गुजरात) जहां दर्जी समाज के महान संत एवं गुरु दामोदर जी महाराज का आविर्भाव हुआ आज भी दर्जी समाज की आस्था का केंद्र बना हुआ है|   संत दामोदर जी महाराज  का जन्म  चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि संवत १४२४   (5अप्रैल 1367) को गुजरात के जूनागढ़  के एक आध्यात्मिक परिवार मे हुआ था|उनके पिता का नाम हेमचन्द्र और माता का नाम जयंती था| हेमचन्द्र जी श्री कृष्ण के परम भक्त थे| और परिवार मे धार्मिक अनुष्ठान होते रहते थे| पारिवारिक आध्यात्मिकता से प्रभावित दामोदर जी महाराज ने आजीवन  ब्रह्मचर्य  धर्म का पालन करते  हुए  एक  समाज सेवक और धर्मोपदेशक का जीवन निर्वाह करने का संकल्प लिया|  संत दामोदर जी महाराज के समकालीन हिन्दू संत श्री रामानंदाचार्यजी हुए थे। 
 दामोदर वंशी दर्जी समाज के आदि पुरुष पूज्य दामोदर जी महाराज हैं। उन्हें समाज के संस्थापक और आराध्य देव के रूप में माना जाता है।दामोदर जी महाराज को समाज के लोग पूजते हैं और उनकी कथाओं और कहानियों को सुनते हैं।दामोदर जी महाराज का जीवन सादगी और सेवा से भरा हुआ था। 
दामोदर जी महाराज एक महान संत थे जिन्होंने समाज के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश दिए। उनकी रचना, "दामोदर दोहावली" में सामाजिक समरसता और सद्भाव की अवधारणा को बहुत ही सुंदरता से व्यक्त किया गया है। 
दामोदर जी महाराज के दोहों में जीवन जीने की कला, सद्गुणों का महत्व, और ईश्वर के प्रति भक्ति की भावना को बहुत ही सुंदरता से व्यक्त किया गया है। उनके उपदेशों में समाज के लिए एकता, सहयोग, और प्रेम की भावना को बढ़ावा देने का संदेश है।छपी हुई पुस्तक के रूप मे न सही पर जूनागढ़ रियासत के उनकेअनुयायी दर्जी समुदाय और लोकजीवन मे उनके उपदेशों और दोहों की अनुगूँज आज भी प्रस्फुटित होती है|  
  संत दामोदर जी महाराज के उपदेशों और ज्ञान की महानता के कारण, उनके अनुयायियों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। वे दामोदर वंशी के नाम से जाने जाने लगे,जो उनके नाम और उनके अनुयायियों के बीच एक गहरा संबंध दर्शाता है।
 संत दामोदर जी एक महान आध्यात्मिक गुरु और संत थे, जिन्होंने गुजरात और भारत के अन्य हिस्सों में अपने ज्ञान और उपदेशों का प्रसार किया। उनकी शिक्षा और उपदेश सरल और सर्वग्राह्य थे, जो लोगों को उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद करते थे।
उन्हें चमत्कारिक संत माना जाता था और लोग अपने दुख-दर्द से मुक्ति पाने के लिए उनके पास आते थे। दामोदर जी महाराज श्री कृष्ण भगवान के अनन्य आराधक थे, और उनकी भक्ति और समर्पण कृष्ण भगवान के प्रति अद्वितीय था।
जूनागढ़ के दामोदर कुंड

से उनका आध्यात्मिक संबंध होने की किंवदंतियाँ प्रचलित हैं, जो उनके जीवन और आध्यात्मिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनकी शिक्षाएँ और उपदेश आज भी लोगों को प्रेरित और मार्गदर्शन करते हैं
दर्जी समाज के महान तत्वदर्शी संत दामोदर महाराज के जीवन और शिक्षाओं ने अनेक लोगों को प्रभावित किया है। उनके जीवन के अज्ञात तथ्यों पर अनुसंधान करने से उनके जीवन और कार्यों के बारे में गहराई से समझने में मदद मिल सकती है।
दामोदर महाराज के जीवन और शिक्षाओं पर अनुसंधान करने वाले विद्वानों को उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करना चाहिए, जैसे कि उनका जीवन परिचय, उनकी आध्यात्मिक यात्रा, उनकी शिक्षाएं और उनके अनुयायियों पर उनका प्रभाव।
 इसके अलावा,अनुसंधानकर्ता दर्जी समाज के इतिहास और संस्कृति का भी अध्ययन कर सकते हैं, जिससे उन्हें दामोदर जी  महाराज के जीवन और कार्यों के संदर्भ में गहराई से समझने में मदद मिल सकती है।
 संत दामोदर जी महाराज के ज्ञान और उपदेशों ने न केवल दर्जी समाज को बल्कि अन्य समुदायों को भी प्रभावित किया और उन्हें जीवन जीने के एक नए दृष्टिकोण की ओर प्रेरित किया
उनकी शिक्षाएं आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं और हमें एक बेहतर समाज के निर्माण में मदद कर सकती हैं
उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक सामाजिक और धार्मिक कार्य किए, जिनमें से कुछ प्रमुख कार्य हैं:
- गरीबों और असहाय लोगों की मदद करना
- विधवाओं और अनाथों की सेवा करना
- लोगों को धार्मिक शिक्षा देना
- छुआछूत का विरोध करना
- महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ना
- जाति प्रथा का विरोध करना
 उनकी जीवनी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने जीवन को दूसरों की सेवा के लिए समर्पित करना चाहिए और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।
 दामोदर वंशी दर्जी समाज के लोग श्री दामोदर जी महाराज की पूजा करते हैं और उनकी जयंती और पुण्यतिथि को विशेष तौर पर मनाते हैं। समाज के लोगों का मानना है कि  श्री दामोदर जी महाराज की कृपा से वे अपने जीवन में सुख और समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं|

महा निर्वाण-

  दामोदर वंशी दर्जी समाज के इस महान संत का महा निर्वाण   27  मार्च 1440  तदनुसार चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी संवत १४९७  को उनके दामोदर आश्रम मे हुआ था| दामोदर दर्जी समाज आज भी उनके बताए मार्ग पर चल रहा है जिससे उनके जीवन मे सुख समृद्धि का वास होता है| 

दामोदर वंशी दर्जी समुदाय का गुजरात से पलायन के कारण निम्नलिखित हैं:

जूनागढ़ के मुस्लिम शासक महमूद बेगड़ा  के अत्याचारों और हिंदुओं को जबरन मुसलमान बनाने की वजह से कई हिंदू परिवारों को 1505 ईस्वी मे अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए गुजरात छोड़ना पड़ा। ये परिवार मध्य प्रदेश और राजस्थान में विस्थापित हो गए, जहां उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान और संस्कृति को बनाए रखने की कोशिश की।
इस घटना का उल्लेख इतिहास में मिलता है और यह एक महत्वपूर्ण अध्याय है|

दामोदर दर्जी समाज का इतिहास

  इतिहासकारों के मतानुसार जूनागढ़ के मुस्लिम शासकों द्वारा प्रताड़ित होने ,जोर- जुल्म -अत्याचारों और जबरन इस्लामीकरण की वजह से दामोदर वंशीय दर्जी समाज के दो जत्थे गुजरात को छोड़कर मध्य प्रदेश और राजस्थान में विस्थापित हुए।
पहला जत्था 1505 ईस्वी में महमूद बेगड़ा के शासनकाल में विस्थापित हुआ,और दूसरा जत्था 1610 ईस्वी में नवाब मिर्जा जस्साजी खान बाबी के शासनकाल में गुजरात मे अपने मूल स्थानों को छोड़ने  पर विवश हुआ और मध्य प्रदेश व राजस्थान मे आकर रहने लगा| 
 यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी जिसने कई हिंदू दर्जी परिवारों को अपने घरों और मूल स्थानों को छोड़ने के लिए मजबूर किया। उन्हें अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए एक नए स्थान पर बसना पड़ा, जो उनके लिए एक चुनौतीपूर्ण और दर्दनाक अनुभव था।
 इन दोनों जत्थों के लोगों के गुजरात  से पलायन  के बीच 105 साल का अंतर होने के कारण, पहले जत्थे के लोग "जूना गुजराती दर्जी " और दूसरे जत्थे के लोग "नए गुजराती दर्जी" कहलाने लगे।
  दामोदर वंशी दर्जी समाज के परिवारों की गौत्र क्षत्रियों की है, जिससे यह ज्ञात होता है कि इनके पुरखे क्षत्रिय थे। जूना गुजराती समाज के लोग "सेठ" उपनाम का उपयोग करते हैं, जो उनकी वंशावली और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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